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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, Verses 35–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 79, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

पश्चात्तां जनपदमण्डलीं समन्ताद्भावत्कीमुरुजठरा क्षणाद्ग्रसेऽहम् । एवं ते भवतु सुराजतेति मन्ये मूर्खाणामतिरस एव संक्षयाय ॥ ३५ ॥ इत्युक्त्वा विपुलगभीरमेघनादप्रोल्लासप्रकटगिरा निशाचरी सा । तूष्णीमप्यतिविकटाकृतिस्तदासीच्छुद्धान्तः शरदमलाभ्रमण्डलीव ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

तुमको खाने के बाद प्रचुर जठराग्नि से सम्पन्न मैं तुम्हारे जनपदों को एक क्षण भर में निगल जाउँगी, उक्त प्रश्नों के उत्तरप्रदान से तुम्हारी अपने साथ सब प्रजाका पालन करने के कारण सुराजता बनी रहेगी, ऐसा में समझती हूँ, मूर्खो की (अनात्मज्ञानियों की) भोगलम्पटता की अधिकता उनके नाश के लिए ही होती है । अगर मैं तुम्हारा भक्षण न भी करूँ, तो भी तुम्हारा राज्य के अन्त में नरकपात अवश्य ही होगा । प्रचण्ड मेघनिर्घोषिके उल्लास के समान प्रकट वाणी से ऐसा कहकर शरत्काल की निर्मल मेघमण्डली के समान भीतर शुद्ध ओर बाहर से कट्‌ बोलनेवाली अत्यन्त विकटाकार वह राक्षसी चुप हो गई