Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 32–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
कालाकाशक्रियासत्ता जगत्तत्रास्ति वेदने ।
स्वामी कर्ता पिता भोक्ता आत्मत्वाच्च न किंचन ॥ ३२ ॥
अणुत्वमजहत्सोऽणुर्जगद्रत्नसमुद्गकः ।
मातृमानप्रमेयात्म जगन्नास्तीति केवले ॥ ३३ ॥
स एव सर्वजगति सर्वत्र कचति स्फुटम् ।
यदा जगत्त्समुद्गेऽस्मिंस्तदासौ परमो मणिः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश आदि का जनक कौन हे, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं।
काल, आकाश, क्रिया आदिकी सत्ता ओर जगत् उस ज्ञानस्वरूप में हैं, व्यवहारदृष्टि से
वही सबका स्वामी, कर्ता, पिता, भोक्ता हे, परमार्थदुष्टि से आत्मा होने के कारण वह कुछ भी
नहीं हे