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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

कटकत्वेऽकृतेऽदृष्टे सुवर्णत्वमिवाततम् । केवलं निर्मलं शुद्धं ब्रह्मैव परिदृश्यते ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव दृश्यरूप से उसकी कल्पना न करने पर और कल्पना करके भी दृश्यरूप से न देखने पर दृश्य के ब्रह्मरूप होने से परमयुरुषार्थता सिद्ध होती है, इस आशय से कहते है । जैसे कटकता की कल्पना न करने पर और करने पर भी उसका दर्शन न करने पर सुवर्णता व्याप्त रहती हे, वैसे ही दृश्यता की कल्पना न करने पर ओर कल्पना करने पर भी उसका दर्शन न करनेपर केवल निर्मल शुद्ध ब्रह्म ही दिखाई देता है