Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
चिदणोः परमस्यान्तः सदिवासदिवापि वा ।
बीजेऽन्तर्द्रुमसत्तेव स्फुरतीदं जगत्स्थितम् ॥ ५ ॥
सत्किंचिदनुभूतित्वात्सर्वात्मकतया स्वतः ।
तदात्मकतया पूर्वं भावाः सत्तां किलागताः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
किस अणु के अन्दर लाखों ब्रह्माण्ड लीन होते हैं, इस प्रश्न का समाधान करते हैं। परम
चिदणु के अन्दर अज्ञानियों की दृष्टि से सत्ू-सा और ज्ञानियों की दृष्टि से असत्-सा स्थित
यह जगत् बीज के मध्य में वृक्ष की सत्ता के समान स्फुरित होता है, इससे (अणौ जगन्ति
तिष्ठन्ति कस्मिन् बीज इव द्वुम: इस प्रश्नका भी उत्तर हो गया ।
सम्पूर्ण वस्तुओं की सत्ता अनुभव सत्ता के अधीन है, उसको यदि अन्य के अधीन मानें,
तो अनवस्था होगी, अतः स्वतःसिद्ध अनुभव सत्ता से ही सब भाव सत्ता को प्राप्त हुए हैं।
इससे 'सदिवासदिवापि वा" इत्यादि से किये गये सत्ता का सत्ताप्रद कौन है ? इस प्रश्न का
समाधान हुआ