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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

न कुड्याकाशयोर्भेदो दृश्यसंवेदनादृते । आब्रह्मजीवकलनाद्यद्रूढं रूढमेव च ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा विषयरूप भेदक के ज्ञान से ही आत्मा विभिन्न-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः भिन्न नहीं है, क्योकि वैसा ही ब्रह्म से लेकर कीटपर्यन्त सभी प्राणियों को दृढ़ अनुभव होता है, ऐसा कहते हैं । भेदक दृश्य के ज्ञान के बिना धरती और आकाश का कोई भेद नहीं है, ब्रह्मा से लेकर कीट-पतंग पर्यन्त को पहले जैसा अनुभव हुआ था, वह वैसा ही बना हुआ है