Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नरूपत्वान्मेरुतो बृहत् ।
वालाग्रशतभागात्माप्येष सूक्ष्मः परोऽणुकः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी अणुता का त्याग नहीं करता हुआ कौन अणु मेरु से भी विशाल आकारवाला है,
इस प्रश्न का उत्तर देते है।
यद्यपि यह चेतन आत्मा बाल के अग्रभाग के शतांश से भी सूषक्ष्मस्वरूपवाला परम अणु है
तथापि देश, काल आदि से अनवच्छिन्न होने के कारण मेरू से भी विशाल हे