Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
मायाकलापिनाणुत्वं निर्माय परमात्मनि ।
हेम्नीव कटकत्वेन नानात्र समता भवेत् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है, तो (अणोरणीयान् महतो महीयान्“ “एषोऽणुरात्मा चेतस्रा वेदितव्यः“ इत्यादि
श्रुतियो में उसका अणुरूप से उपदेश कैसे किया गया ? ऐसी यदि कोड शंका करे, तो
सर्वशक्तिमान् होने के कारण महत्त्व के समान अणुत्व का भी माया द्वारा अपने में निर्माण कर
वह स्थित हे, अतः मुख्य वृत्ति से ही अणुशब्द का उसमें प्रयोग है, सादुश्यवश लाक्षणिक
अणुशब्द का प्रयोग नहीं है, ऐसा कहते है ।
मायाशबल ब्रह्म अपने में ही अणुताका निर्माण कर अणुरूप से स्थित है। अतः जैसे सुवर्ण
में सुवर्णनिर्मित कटकत्व आदि से समता नहीं हो सकती वैसे ही प्रकृत में स्वनिर्मित अणुत्व से
सौक्ष्म्यात् समता नहीं हो सकती । इस प्रकार “बालाग्र शतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ।
भागो जीवः स विज्ञेयः" इत्यादि श्रुतियाँ और बालाग्रशत भागात्मा इत्यादि तुम्हारी उक्ति भी
संगत होती है