Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
चित्तसत्तैवमखिलं स्वतो जगदिवोदितम् ।
मधुमासरसोल्लासाच्चित्रो हि वनखण्डकः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि प्रलय में और सृष्टि में भी ब्रह्म की सत्ता से ही जगत् जीवित रहता है, तो प्रलय की
अपेक्षा सृष्टि में क्या विशेषता है जिससे फिर सृष्टि का आविर्भाव होता है, इस शंका पर
कहते हैं।
जैसे वसन्त ऋतु के रस के उल्लास से वनभाग विचित्र हो उठता है, इसी प्रकार चित्त-
सत्ता ही स्वतः सम्पूर्ण जगद्रूप से उदित होती है। भाव यह कि प्रलय में चित्त-सत्ता पृथक् नहीं
रहती और सृष्टि में रहती हे, प्रलय की अपेक्षा सृष्टि में यही विशेषता है