Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 82–83
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 82–83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 82
संस्कृत श्लोक
सन्नेष चेतनात्मत्वाद्दर्शनानवबोधतः ।
द्वैतैक्ये नात्र विद्येते सर्वरूपे महात्मनि ॥ ८२ ॥
यदि कश्चिद्द्वितीयः स्यात्तदैकस्यैकता भवेत् ।
द्वैतैक्ययोर्मिथः सिद्धिरातपच्छाययोरिव ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
“असत् भी सत् रूप किससे“ पूर्वोक्त इस अंश का तात्पर्य कहते हैं ।
जिनमें आत्मसत्ता संदिग्ध नहीं है, ऐसे चेतनों का आत्मा होने के कारण यह सत् है और
चक्षु आदि द्वारा देखने पर ज्ञात नहीं होता, अतः इस सर्वरूप महान् आत्मा में लौकिक सद्रूप
द्वैत और एेक्य नहीं है, इसलिए यह श्रुति मेँ असत् कहा गया है, वास्तव में असत्ता के अभिप्राय
से असत् नहीं कहा गया है