Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 89
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 89 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 89
संस्कृत श्लोक
द्वैताद्वैतोपलम्भो हि दुःखायैव क्रियात्मने ।
निपुणोऽनुपलम्भो यस्त्वेतयोस्तत्परं विदुः ॥ ८९ ॥
हिन्दी अर्थ
द्वैत और
अद्वैतकी प्रतीति दुःखरूप प्रवृत्ति की सिद्धि के लिए ही है, निवृत्ति के लिए नहीं है ओर जो इन
द्वैत और अद्वित की उत्तम अप्रतीति है, वह परमपद है