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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 32–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verses 32–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 32-35

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति तस्यां तदा रात्र्यां राक्षसीमन्त्रिभूभृतः । जग्मुस्ते सरितस्तीरं मिथः संजातसौहृदाः ॥ ३२ ॥ अन्वयव्यतिरेकेण राक्षस्याः सौहृदं तदा । ज्ञात्वा स्थितौ तौ स्वाचान्तावुभावन्तेनिवासिनौ ॥ ३३ ॥ तया ब्रह्मोपदिष्टोऽसौ ततस्ताभ्यां यथाक्रमम् । स्नेहाद्विषूचिकामन्त्रः प्रदत्तो जपसिद्धिदः ॥ ३४ ॥ ततः संजातसौहार्दौ तौ विसृज्य निशाचरी । यदा गन्तुं प्रवृत्तासौ तदा राजाब्रवीद्वचः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार उस रात्रि में राक्षसी, मन्त्री ओर राजा तीनों, जिनमें परस्पर मित्रता हो गई थी, नदीके निर्जन तट पर गये तब अन्वय ओर व्यतिरेक से राक्षसी की मैत्री को जानकर आचमन किये हुए वे दोनों राक्षसीके शिष्य होकर बैठे, तदुपरान्त उक्त राक्षसी ने ब्रह्माजीके द्वारा उपदिष्ट जप से सिद्धि देनेवाला वह विसूचिकामन्त्र क्रमश: उनको स्नेहपूर्वक दिया । तदनन्तर उन राजा और मन्त्री से, जिनके साथ उसकी मित्रता हो गई थी, विदा होकर जब वह राक्षसी चलने लगी, तब राजा ने उससे कहा