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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

भेदो दृश्यत एवायं व्यवहारान्न वास्तवः । वेतालो बालकस्येव कार्यार्थं परिकल्पितः ॥ २० ॥ द्वैतैक्यमपि नो यस्यां तथा भूतार्थसंस्थितौ । अस्ति तस्यामीदृशः स्यात्कुतः संकल्पविप्लवः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

कल्पित पदार्थ से प्रयोजनयुक्त व्यवहार की सिद्धि लोक में भी देखी जाती है । ऐसा कहते हैं । व्यवहार से ही यह भेद देखा जाता है यानी भेद व्यावहारिक है, वास्तविक नहीं है, जैसे बालक को वेताल की कल्पना होती है, वैसे ही व्यवहार के लिए इस भेद की कल्पना की गई है । जहाँ पर यानी स्वप्न या गन्धर्वनगर आदि में द्वैत और ऐक्य नहीं है, वहाँ पर भी इस प्रकार का लक्षण आदि व्यवहार है, अतः सत्यसंकल्पों के उपदेश आदि व्यवहार में संकल्प का विनाश कैसे हो सकता हे २