Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 29–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verses 29–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

महावाक्यार्थनिष्ठान्तां बुद्धिं कृत्वा रघूद्वह । वचोभेदमनादृत्य यदिदं वच्मि ते श्रृणु ॥ २९ ॥ यतःकुतश्चिदुच्छ्रायं गन्धर्वपुरवन्मनः । भ्रान्तिमात्रं तनोतीदं जगदाख्यं स्वजृम्भणम् ॥ ३० ॥ यथा चेतस्तनोतीमां जगन्मायां तथानघ । श्रृणु त्वं कथयामीदं दृष्टान्तं दृष्टिवेदनम् ॥ ३१ ॥ यं श्रुत्वा सर्वमेवेदं भ्रान्तिमात्रमिति स्वयम् । राम निश्चयवान्भूत्वा दूरे त्यक्ष्यसि वासनाम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि द्वैत नहीं है, तो “यतो वा“ इत्यादि ब्रह्मलक्षणबोधक श्रुतिवाक्य में पंचमी” आदि विभक्ति के अर्थ भेद का परिज्ञान नहीं होना चाहिए, इस पर कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, पंचमी आदि से अवगत वचोभेद का (द्वैतका) परित्याग कर "यतो वा इमानि" इत्यादि लक्षणवाक्य से उत्पन्न बुद्धि को अखण्ड महावाक्यार्थ में यानी तत्त्वमस्यादि महावाक्यार्थभूत ब्रह्म में ही निष्ठावाली यानी पदों के वाच्य और लक्ष्य अर्थो की व्युत्पत्ति के द्वारा पर्यवसन्न कर यह जो कुछ मैं आपसे कहता हूँ, उसे सुनिये ॥