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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 35–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

एवं स्थिते जगद्रूपं चित्तमेवेह जृम्भते । न विद्यते शरीरादि सिकतान्तरतैलवत् ॥ ३५ ॥ चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशदूषितम् । तदैव तैर्विनिर्मुक्तं भवान्त इति कथ्यते ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

मेरे द्वारा उपदिष्ट अर्थ के अवधान में स्थित आप विवेकरूपी ओषधि- मात्रा से मनोव्याधि की चिकित्सा करने के लिए प्रयत्न भी करेगे ॥ ३ ४॥ ऐसी अवस्था मे यानी वक्ष्यमाण (कही जानेवाली) आख्यायिका की प्रणाली से ऐसा निश्चय होने पर चित्त ही जगद्रूप से विकास को प्राप्त हुआ है, जैसे बालू के अन्दर तेल नहीं रहता, वैसे ही शरीर आदि की सत्ता नहीं हे । राग, द्वेष आदि क्लेशो से दूषित यह चित्त ही संसार है । जब उनसे पुरुष मुक्त होता है तब संसार का नाश कहा जाता हे