Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अविद्यमानमेवेदमादिसर्गे धरादिकम् ।
निराकृतिरजः स्वप्नं पश्यतीव न पश्यति ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ का पूर्वोक्त सृष्टिक्रम के स्मरण द्वारा उपपादन करते हैं ।
सृष्टि के आरम्भमें यह सब पृथ्वी आदि अविद्यमान यानी असत् ही थे, इनको आकार-
रहित ब्रह्मा स्वप्न के समान देखते हुए भी नहीं देखते हैं