Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
सर्वगेनात्मना व्याप्तं स्वचेत्यात्मवपुर्मनः ।
आततं सौम्य विमलं वारीव रवितेजसा ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सूर्यतेज से
सौम्य और निर्मल जल व्याप्त रहता है, वैसे ही सर्वव्यापी आत्मा से अपना चेत्यस्वरूपभूत
मन व्याप्त है, चित् की व्याप्ति के कारण उसमें सर्वार्थवबीजता है