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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verses 15–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 85, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

कालचक्रपरिप्रोता यद्भावाः सकलर्तवः । यथाकालं फलापूर्णा भूषयन्त्यभितो महीम् ॥ १५ ॥ प्रौढ्यं शुभाशुभाचारस्मृतयः ककुभं प्रति । नरकस्वर्गफलदाः सर्वत्र समुपागताः ॥ १६ ॥ भोगमोक्षफलार्थिन्यः समस्ता भूतजातयः । स्वमीहितं यथाकालं प्रयतन्ते यथाक्रमम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

कालचक्र में गुँथी हुई शीत, ग्रीष्म, वर्षा आदि स्वभाववाली सब ऋतुएँ अपने अपने अवसर पर फलों से पूर्ण होकर पृथ्वी को चारों ओरसे भूषित करती हैं। प्रत्येक दिशा में सभी वर्णो में विहित और निषिद्ध आचार का प्रतिपादन करने वाली तथा स्वर्गनरकरूप फल का प्रतिपादन करनेवाली स्मृतियाँ प्रौढता को प्राप्त हुई हैं। भोग और मोक्षरूप फल को चाहनेवाले सम्पूर्ण प्राणी अपनी-अपनी इच्छानुसार अवसर-अवसर पर अपने अपने प्रवृत्तिक्रम के अनुसार यत्न करते हैं