Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 30–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 86, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
भाषमाणेष्वथैतेषु ज्येष्ठो भ्राता महामतिः ।
गम्भीरवागुवाचेदं मृगयूथान्मृगो यथा ॥ ३० ॥
ऐश्वर्याणां हि सर्वेषामाकल्पं न विनाशि यत् ।
रोचते भ्रातरस्तन्मे ब्रह्मत्वमिह नेतरत् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जब वे भाई परस्पर वैसा कह रहे थे, इतनेमें
जैसे मृगयूथ से एक मृग अन्य मृगों से कहता है वैसे ही महामति ज्येष्ठभ्राता ने, जिसकी
वाणी अत्यन्त गम्भीर थी, यह वचन कहा