Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 88, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 88, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
चित्तनेत्रैर्भवानेतान्सर्गानन्यस्य नो दृशा ।
अवश्यं चक्षुषा सर्गं सृष्टमित्येव वेत्ति कः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उनकी सृष्टि से मुझे सन्तोष हो, तथापि मेरी सृष्टि उनसे गतार्थ क्यो नहीं है ? इस पर
कहते हैं।
भगवन्, आप अन्य की इन सृष्टियों को चित्तरूपी नेत्र से ही देखते हैं, चक्षुसे नहीं देखते ।
उनकी सृष्टि करनेवाला तो अपनी की हुई सृष्टि को “मैंने यह रचा" यों अपने नेत्र से ही जानता
है, इसलिए आपके नेत्रगोचर होनेवाली आपकी सृष्टि अन्य की सृष्टि से गतार्थ नहीं है