Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 88, Verses 17–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 88, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
न चैतान्दश संसारान्दश नीरजसंभवान् ।
कश्चिन्नाशयितुं शक्तश्चित्तदार्ढ्याच्चिरस्थितान् ॥ १७ ॥
कर्मेन्द्रियैर्यत्क्रियते तद्रोद्धुं किल युज्यते ।
न मनोनिश्चयकृतं कश्चिद्रोधयितुं क्षमः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है, तो मेरे मन से दिखाई देनेवाली यह ऐन्दव सृष्टि वृथा है और मेरे प्रतिकूल है;
इसलिए इसका मुझे विनाश कर देना चाहिए, इस पर कहते हैं।
इन दस ब्रह्माण्डों का और इनके रचयिता दस ब्रह्माओं का कोई भी विनाश नहीं कर
सकता, क्योकि ये चित्त की दृढता से बहुत काल से स्थित हैं