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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 88, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 88, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

निष्कामादेव भवतः सर्गः संपद्यते प्रभो । अर्कादिव जलादित्यप्रतिबिम्बमिवाधियः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे प्रभो, निष्काम आपसे किसी प्रकार के मानसिक व्यापार के बिना ऐसे सृष्टि होती है, जैसे कि निर्मनस्क सूर्य से जलादित्यरूप सूर्य का प्रतिबिम्ब होता है