Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verses 37–49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 89, verses 37–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 37-49

संस्कृत श्लोक

प्रपञ्चमात्रमेवायं देहो दृश्यत एव हि । समकालप्रयुक्तेन सहसा दण्डराशिना ॥ ३७ ॥ वीरं मनो भेदयितुं मनागपि न शक्यते । का नाम ता महाराज कीदृश्यः कस्य शक्तयः ॥ ३८ ॥ याभिर्मनांक्त भिद्यन्ते दृष्टनिश्चयवन्त्यपि । वृद्धिमायातु वा देहो यातु वा विशरारुताम् ॥ ३९ ॥ भावितार्थाभिपतितं मनस्तिष्ठति पूर्ववत् । इष्टेऽर्थे चिरमाविष्टं दधानं तत्स्थितं मनः ॥ ४० ॥ भावाभावाः शरीरस्था नृप शक्ता न बाधितुम् । भावितं तीव्रवेगेन मनसा यन्महीपते ॥ ४१ ॥ तदेव पश्यत्यचलं न शरीरविचेष्टितम् । न काश्चन क्रिया राजन्वरशापादिका अपि ॥ ४२ ॥ तीव्रवेगेन संपन्नं शक्ताश्चालयितुं मनः । तीव्रवेगेन संयुक्तं पुरुषा ह्यभिवाञ्छितात् ॥ ४३ ॥ मनश्चालयितुं शक्ता न महाद्रिं मृगा इव । ममेयमसितापाङ्गी मनःकोशे प्रतिष्ठिता ॥ ४४ ॥ देवागारे महोत्सेधे देवी भगवती यथा । न दुःखमनुगच्छामि प्रियया जीवरक्षया ॥ ४५ ॥ गिरिर्ग्रीष्मदशादाहं लग्नयेवाब्दमालया । यत्र यत्र यथा राजंस्तिष्ठाम्यभिपतामि वा ॥ ४६ ॥ तत्रेष्टसंगमादन्यत्किंचिन्नानुभवाम्यहम् । अहल्यादयितानाम्ना मनसेन्द्राभिधं मनः ॥ ४७ ॥ संसक्तमिदमायाति न स्वभावादृते परम् । एककार्यनिविष्टं हि मनो धीरस्य भूपते ॥ ४८ ॥ न चाल्यते मेरुरिव वरशापबलैरपि । देहो हि वरशापाभ्यामन्यत्वमिव गच्छति । ननु धीरं मनो राजन्विजिगीषुतया स्थितम् ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह देह मन का विस्तारमात्र ही देखा जाता है । यदि कहिए मै मन को ही दण्ड से नष्ट कर डालूँगा, तो उसपर कहते हैँ -एक काल में प्रयुक्त अनेक दण्डों से इस वीर मन का तनिक भी भेदन नहीं किया जा सकता। हे राजन्‌ वे किसकी ओर कैसी शक्त्यो हैं, जिनसे वे भी मन, जिनका कि तद्‌भावापरित्तरूप निश्चय अनुभूत है, भिन्न किये जाते हों । देह चाहे वृद्धि को प्राप्त हो, चाहे नष्ट भ्रष्ट हो जाय, किन्तु विचारित (भावित) अर्थ के अभिमुख हुआ मन पूर्ववत्‌ स्थिर रहता हे । हे राजन्‌, अपने इष्ट अर्थ चिरकाल से अभिनिविष्ट (आग्रहयुक्त) और उसमें स्थित मन को शरीर में स्थित भाव ओर अभाव पीडित करने के लिए समर्थ नहीं होते । हे राजन्‌, तीव्रवेगवाले मन से जो वस्तु भावित होती है, उसीको पुरुष स्थिररूप से देखता हे, शरीर द्वारा किये गये कार्य को नहीं देखता । हे राजन्‌, महात्माओं की वर, शाप आदि कोई भी क्रियाँ तीव्रवेग से युक्त मन को उसके अभीष्ट पदार्थ से विचलित नहीं कर सकती । जैसे मृग महा पर्वत को विचलित नहीं कर सकते, वैसे ही पुरुष तीव्रवेग से युक्त मन को अपने अभीष्ट पदार्थ से विचलित करने में समर्थ नहीं होते । जैसे बहुत ऊँचे देवालयमें भगवती देवी प्रतिष्ठित होती है, वैसे ही यह सुन्दरी मेरे मनःकोष में प्रतिष्ठित हे । मेरे जीवनकी रक्षा करनेवाली इस प्रिया से युक्त में दुःख का अनुभव वैसे ही नहीं करता, जैसे कि शिखर पर स्थित मेघमाला से युक्त पर्वत ग्रीष्मतऋतु की तपन का अनुभव नहीं करता । हे राजन्‌, मैं जहाँ-जहाँ रहता हूँ. अथवा गिरता हूँ, वहाँ पर इच्छित पदार्थ के लाभसे अतिरिक्त तनिक भी किसीका अनुभव नहीं करता । अहल्यारूप प्रिया नामवाले मनसे इन्द्र नामक मन ही भलीभाँति संबद्ध होकर यानी एक ही मन दो वेषो से अहल्या और इन्द्ररूप से दढता से सम्बद्ध होकर स्वभाव से अतिरिक्त अन्य विषयको प्राप्त नहीं होता यानी सैंकड़ों प्रयत्नो से भी उसका स्वभाव दूसरे रूप में परिणत नहीं किया जा सकता । हे राजन्‌, धीर का मन एक कार्यमिं निविष्ट (एकाग्र) होता है। वह महात्माओं के वर और शाप के प्रभाव से भी मेरु की तरह चलित नहीं होता । देह वर ओर शाप से अन्यता को प्राप्त होती है, किन्तु धीर मन सम्पूर्ण विक्षेपं के विजिगीषु के रूप से स्थिर रहता है