Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 9, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कथमेवं वद ब्रह्मन्भूयते विषमा हि मे ।
दृष्टिरेषाथ दुष्प्राप्या दुराक्रम्येति निश्चयः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
पुरुष को समदृष्टि प्राप्त करने में अनेकानेक विध्नबाधाएँ उपस्थित होती है, अतः समदृष्टि
दुर्लभ है। जब समद्ृष्टि दुर्लभ है, तब मुक्ति की दुर्लभता घरी धराई है, ऐसा समझ रहे मुक्ति
की प्राप्ति के उपाय के प्रति उत्कण्ठित श्रीरामचन्द्रजी ने कहा :
भगवन्, कृपा करके कहिए कि जैसा आपने कहा है, वैसा मैं कैसे हो सकता हूँ ? क्योकि
मेरी दृष्टि विषम है। ऐसी अवस्था में मुक्ति दुष्प्राप्य है । यदि यथाकिंचित प्राप्त भी हो जाय,
तो उसमें चित्त को स्थिर रखना कहीं कठिन है । वह हाथमे आकर भी स्थायी नहीं हो सकती,
ऐसा मेरा निश्चय है