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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 90, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 90, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

अकृत्रिमप्रेमरसानुविद्धं स्नेहं तयोस्ते प्रतिवीक्ष्य कान्तम् । वृक्षा अपि प्रेमरसानुविद्धाः शृङ्गारचेष्टाकुलिता भवन्ति ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

अकृत्रिम प्रेमरस से पूर्ण उनके उस सुन्दर स्नेह को देखकर वृक्ष भी प्रेमरस से युक्त होकर श्रंगारचेष्टायुक्त होते हैं, फिर औरों की तो बात ही क्या हे ?