Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 92, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
पौरुषेण बलेनान्तश्चित्तं कृत्वा प्रियामयम् ।
कृत्रिमेन्द्रेण दुःखार्तिर्न दृष्टा सा मनागपि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जब विषयदोष में भी मन की दृढता होने पर दुःखका दर्शन नहीं होता, तब पवित्र विषयमें
मनकी दृढता होने पर दुःख का दर्शन नहीं होता, इसमें कहना ही क्या है ? इस आशय से
इन्द्रोपाख्यान आदिक का स्मरण कराते हैं ।
पौरुष बल से अपने अन्दर चित्त को प्रियामय बनाकर कृत्रिम इन्द्रको उस भीषण दुःखपीड़ा
का तनिक भी अनुभव नहीं हुआ