Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 93, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
तेऽभ्युत्थिता एव चिन्नभसो नभसि तन्मात्रैरावलिता गगनपवनान्तर्वर्तिनश्चतुर्दशविधा ये भूतजातमध्यतयाभ्यासे तिष्ठन्ति तस्या एव प्राणशक्तिद्वारेण प्रविश्य शरीरं स्थावरं जंगमं वापि बीजतां गच्छन्ति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
वे चिदाकाश से ही उत्पन्न होकर मायाकाश में
तन्मात्रोपाधियों के (भूतमात्रोपाधियों के) साथ मिलकर आकाश में स्थित आवह, उद्वह आदि
भेदों से भिन्न वायुओं के उनचास स्तरों के मध्यवर्ती चौदह लोकों में जिस प्रकार की भूत
जाति में रहने से जिस प्रकार की वासना और कर्म से अभिनिविष्ट होते हैँ । उसी भूतजाति के
प्राणशक्ति द्वारा स्थावर या जंगम शरीर में प्रविष्ट होकर रज-वीर्यरूप बीजता को प्राप्त होते
हँ