Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 93, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
काश्चिज्जनसहस्रान्ताः पतन्ति वनपर्णवत् ।
कर्मवात्या परिभ्रान्ता लुठन्ति गिरिकुक्षिषु ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई जीव जिनको हजारों वर्षो के बाद तत्त्वज्ञान
होनेवाला है, कर्मरूपी बकँडर से भ्रान्त होकर पर्वतों के मध्य में वन के पत्तों की नाई संसार में
पड़ते हैं और इधर उधर लुढ़कते हैं, तदनन्तर मुक्त हो जाते हैँ । भाव यह है कि जब तक मोक्ष
न हो तब तक इच्छा के अनुसार जन्मपरम्परा होती रहती है