Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verses 6–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 93, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
ततस्तेनेयमविद्या परिकल्पिता अनात्मन्यात्माभिमानमयीति तेन ब्रह्मणा गिरितृणजलधिमयमिदं क्रमेण जगत्परिकल्पितम् ॥ ६ ॥
इत्थं क्रमेण ब्रह्मतत्त्वादियमागता सृष्टिरन्यत एवागतेयमिति लक्ष्यते ॥ ७ ॥
तस्मात्सर्वपदार्थानां त्रैलोक्योदरवर्तिनाम् ।
उत्पत्तिर्ब्रह्मणो राम तरङ्गाणामिवार्णवात् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि उनके संकल्प से जगत् की उत्पत्ति भले ही हो, पर जीवों का
उसमें अभिमान कैसे होता है ? तो उस पर कहते हैं।
तदनन्तर उन्होने इस अविद्या की (४६) कल्पना की । वह अनात्मा में आत्माभिमानरूप
है । इस रीति से उस ब्रह्मा ने पर्वत, तृण, समुद्र रूप इस जगत् की क्रम से कल्पना की । यद्यपि
इस क्रम से चिदेकरस ब्रह्मतत्त्व से यह सृष्टि आई है, तथापि तार्किक लोगों को अन्य से यानी
जड प्रधान, परमाणु आदि से यह प्राप्त हुई है, ऐसी प्रतीति होती हे