Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 95, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 95, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 95 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
सर्वसंकल्पनामुक्ते जीवा ब्रह्मणि निर्मले ।
स्फुरन्ति वितते व्योम्नि नीलिमेवाज्ञचक्षुषः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवान् ने भी श्रीमुखसे कहा है - न कर्तृत्विं कर्माणि लोकस्य सजति प्रभु: । न
कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तती” भगवान् न लोगों के कर्तृत्व की सृष्टि करते हैं, न कर्मोकी
सृष्टि करते हैं और न कर्मों के फल के संयोग की सृष्टि करते हैं, किन्तु जीवकी अविद्यारूप
प्रकृति स्वयं कर्म आदिरूप से प्रवृत्त होती है । उनके आविर्भाव में और अभेदाध्यासमें जीवों
का स्वभाव नामस प्रसिद्ध अपना अज्ञान ही कारण है, यों दरष्टान्तपूर्वक कहते हैं ।
जैसे अज्ञानी लोगों की दृष्टि में विस्तृत निर्मल आकाशमें नीलिमा स्फुरित होती है वैसे ही
सब संकल्पनाओं से रहित निर्मल ब्रह्य में अज्ञ लोगों की दृष्टि में ये जीव स्फुरित हुए हैं