Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
परायाः संविदो ब्रह्मन्नेताः पर्यायवृत्तयः ।
कल्प्यमानविचित्रार्थाः कथं रूढिमुपागताः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य कल्पना में उन्मुख चित् में प्रवृत्तिनिमित्त के भेद से योगरूढ़ि से पूर्वोक्त मन, बुद्धि
आदि नामों की पययिता को, प्रत्येक के निर्वचन द्वारा, विशेषरूप से जाननेकी इच्छा कर रहे
श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं ।
ब्रह्मन्, चिद्घन ज्ञानघन परमात्मा के ये मन आदि पर्याय, जिनके विचित्र यौगिक अर्थकी
कल्पना की गई है, केसे प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं