Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 47–51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verses 47–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 47-50
संस्कृत श्लोक
मनो हि जडमन्यस्य भिन्नमन्यस्य जीवतः ।
तथाहंकृतिरन्यस्य बुद्धिरन्यस्य वादिनः ॥ ४७ ॥
अहंकारमनोबुद्धिदृष्टयः सृष्टिकल्पनाः ।
एकरूपतया प्रोक्ता या मया रघुनन्दन ॥ ४८ ॥
नैयायिकैरितरथा तादृशैः परिकल्पिताः ।
अन्यथा कल्पिताः सांख्यैश्चार्वाकैरपि चान्यथा ॥ ४९ ॥
जैमिनीयैश्चार्हतैश्च बौद्धैर्वैशेषिकैस्तथा ।
अन्यैरपि विचित्रैस्तैः पाञ्चरात्रादिभिस्तथा ॥ ५० ॥
सर्वैरेव च गन्तव्यं तैः पदं पारमार्थिकम् ।
विचित्रं देशकालोत्थैः पुरमेकमिवाध्वगैः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
उनके कल्पनाप्रकारों का विभाग कर दिखलाते हैं।
किसी वादी के मत में मन जड़ है, किसीके मत में जीव से भिन्न है, किसीके मतमें
अहंकारनाम से उसका निर्देश है और किसीके मतमें वह बुद्धि कहा गया है। हे श्रीरामचन्द्रजी,
अन्तःकरण के एकरूप होने के कारण उसकी संकल्प आदि भिन्न-भिन्न वृत्तियोँ की सृष्टि से
हुए अहंकार, मन, बुद्धि आदि भिन्न नाम जो मैंने आपसे कहे हैं, उनकी नैयायिकों ने अपनी
बुद्धि के विकल्पों से अन्यथा कल्पना कर रक्खी हे । वे कहते हैं ~ द्रव्यविशेष विभु आत्मा
अहंकार (अहंप्रत्ययविषय) है, मन अणु है, वह आत्मसाक्षात्कार में कारण है और बुद्धि आत्मा
का गुण है और तीन क्षणो तक रहती हे । परन्तु यह उनकी अपनी कपोलकल्पना ही हे ।
वस्तुतः ऐसा है नहीं । सांख्यो ने इनकी अपेक्षा भिन्नरूप से उनकी कल्पना की है । वे कहते
हैं - सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणरूप प्रकृति का अन्तःकरणरूप पहिला परिणाम जिसका
दूसरा नाम महतृतत्त्व भी हे, बुद्धि है, उसका परिणाम अहंकार दूसरा तत्त्व है। मन ग्यारह
इन्द्रियों के अन्तर्गत और सोलह विकारों के मध्यवर्ती है । चार्वाकों ने उनकी दूसरी ही कल्पना
की हे । वे कहते हैं-शरीरका ही चैतन्यरूपी गुण बुद्धि है, शरीर ही अहंकार आत्मा है तथा
उसका पूर्वापरप्रतिसन्धान मन है । मीमांसकं में कोई मन को व्यापक द्रव्य मानतें हैं और कोई
अन्नमय मानते हैं, उनके मतमें जडबोधात्मक अहंकाररूप आत्मा का चिदंश बुद्धि है । जनों
के मत में मध्यमपरिमाणवाला चैतन्य रूप जीवास्तिकाय ही अहंकार हे, उसका विषयाभिलाष
मन है ओर अर्थप्रतीति बुद्धि है । इसी प्रकार बौद्ध, वैशेषिक, पांचरात्र, पातंजल, माहेश्र,
नाकुल आदिने अपनी-अपनी विलक्षण कपोलकल्पनाओं से उक्त अहंकार, मन, बुद्धि आदिकी
अन्यथा कल्पना की हे