Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 55–56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verses 55–56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 55,56

संस्कृत श्लोक

यथैव पुरुषः स्नानदानादानादिकाः क्रियाः । कुर्वंस्तत्कर्तृवैचित्र्यमेति तद्वदिदं मनः ॥ ५५ ॥ विचित्रकार्यवशतो नामभेदेन कर्तृता । मनः संप्रोच्यते जीववासनाकर्मनामभिः ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

क्या मुमुश्च पुरुषो के लिए भी उनके द्वारा कही गई युक्तियाँ उपादेय हैं ? इस पर, “नहीं, मुमुक्षुओं के लिए उनकी युक्तियाँ उपादेय नहीं है , ऐसा कहते हैं। हे रामचन्द्रजी, फल की इच्छा से फलसाधन कर्ममें जिनका चित्त आसक्त हे, ऐसे लोगों के लिए उन्होंने अपनी कल्पना से प्रसूत तत्‌-तत्‌ पदार्थों से अपनी-अपनी वैचित्र्य युक्तियाँ मिथ्या ही कही हैं, वे प्रमाणों में सर्वश्रेष्ठ प्रमाण उपनिषत्‌ के सम्मत नहीं है, यह अर्थ है ॥५ ४॥ यों उनके मिथ्या होने पर परिशेष से हमारे द्वारा कही गई युक्तियाँ ही प्रामाणिक है ऐसा कहते हैं। जैसे कोई ही पुरुष स्नान, दान, प्रतिग्रह आदि क्रियाओं को करता हुआ स्नायी, दाता, प्रतिग्रहीता आदि विचित्र नामों को प्राप्त होता है, वैसे ही वह मन भी विचित्र कार्य करता है, अतः कार्य के अनुसार जीव, वासना, मन आदि नाना नामों से कहा जाता है