Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
आलोक इव रूपाणामर्थानां कारणं मनः ।
बध्यते बद्धचित्तो हि मुक्तचित्तो हि मुच्यते ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आलोक रूपप्रकाशों का कारण है, वैसे ही मन
> उनकी बुद्धि की विचित्रता यानी भेद ही उक्त कलह में हेतु है । रुचिवैचित्रय का कारण है,
देश, काल, पात्र आदि का भेद । कोई पुरुष रजोगुणप्रधान है, तो कोई तमोगुणप्रधान है, कोई
मलिनसत्त्वप्रधान है, कोई अर्धमलिनसत्त्वप्रधान है मुख्य बात तो यह है कि जो जैसा जानता है,
वह वैसा ही कहता है और करता है । उनमें से निर्मलसत्त्वप्रधान ऋषियों के श्रौत ज्ञान से जो विज्ञेय
है, वही अभ्रान्त है । एवं जो केवल अपनी बुद्धि से कल्पित है, यह भ्रान्त है, परंतु काकतालीयन्याय
से वह भी कभी अभ्रान्त हो जाता है।
सब पदार्थों का कारण है, जिस पुरुष का चित्त बँधा रहता है, वह बन्धन में पड़ता है और
जिसका चित्त मुक्त है, यानी वासनारहित है, मैं मुक्त हूँ, यह निश्चयवाला है, वह मुक्ति को
प्राप्त होता है