Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verses 63–64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verses 63–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 63,64
संस्कृत श्लोक
अजडं हि मनो राम संसारस्य न कारणम् ।
जडं चोपलधर्मापि संसारस्य न कारणम् ॥ ६३ ॥
न चेतनं न च जडं तस्माज्जगति राघव ।
मनः कारणमर्थानां रूपाणामिव भासनम् ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
"कलुषित जल के समान मलिन चिद्रूप मन“ इस कथन का तात्पर्य कहते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलिए न तो चेतन मन संसार का कारण है ओर न पत्थर के समान
जड़ मन ही संसार का कारण है । जैसे नील, पीत आदि रूपों का न "भासन" शब्दसे कहा
जानेवाला केवल तेज कारण है ओर न पृथिवी आदि कारण हैं, किन्तु त्रिवृत्करण द्वारा मलिन
हुआ तेज उनका कारण है, वैसे ही केवल जड़ और केवल चेतन मन जगत् में पदार्थो का
कारण नहीं है, किन्तु जड़चेतन मिश्रित मन पदार्थो का कारण है