Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 96, Verse 71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 96, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 96 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
ऊर्णनाभाद्यथा तन्तुर्जायते चेतनाज्जडः ।
नित्यप्रबुद्धात्पुरुषाद्ब्रह्मणः प्रकृतिस्तथा ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोड कटे कि आपके पक्षे भी तो आपका श्रद्धा जाज्ब हेतु क्यो नहीं है ? ऐसी शंका
होने पर यह पक्ष मेरी स्वबुद्धि से कल्पित नहीं है, किन्तु यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा
पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम्“
(जैसे मकड़ी अपने जालेको अपने से ही तानती है और अपने में लीन कर लेती है, जैसे
पृथिवीमें औषधियाँ होती हैं, जैसे सत् (जीवित) पुरुष से केश और रोम निकलते हैं वैसे ही
अक्षर से विश्व की उत्पत्ति होती है) इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध है, इस आशय से कहते हैं।
जैसे चेतन मकड़ी से जड़ तन्तु उत्पन्न होता है वैसे ही नित्यप्रबुद्ध परम पुरुष ब्रह्म से मन
उत्पन्न होता है