Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 97, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
जडोऽस्मि न जडोऽस्मीति निश्चयो मलिनश्चितः ।
यस्तदेव मनो विद्धि तेनाकाशादि भाव्यते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जड़ अंश के मन के आकार में परिणत होने के कारण मनके प्रति मुख्य उपादान होने पर
भी मन मे चित् ओर जाज्य दोनों का अनुभव होने से चित् स्वलित जड़ ही मनोभाव में परिणत
होता है, ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, चित् का “में जड़ हूँ, मैं जड़ नहीं हूँ” इत्याकारक जो मलिन निश्चय है,
उसीको आप मन जानिए । उसीसे आकाश आदि उत्पन्न हुए हैं