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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 97, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 97, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 97 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

चित्तत्वमस्य मलिनस्य चिदात्मकस्य तत्त्वस्य दृश्यत इदं ननु बोधहीनैः । शुक्तौ यथा रजतता नतु बोधवद्भिर्मौर्ख्येण बन्ध इह बोधबलेन मोक्षः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त एकमात्र अज्ञानियों द्वारा दृश्य होने से अज्ञानकार्य है, इससे निश्चित है कि अज्ञानीकी दृष्टि से ही बन्ध है, तत्त्वज्ञकी दृष्टि से तो आत्मा नित्यमुक्त ही है, ऐसा कहते हैं। जैसे व्यावहारिक लोग यानी अज्ञानी पुरुष (जिन्हें तत्त्वज्ञान नही हुआ या जो शास्त्रदर्शी नहीं है) अज्ञान की अधिकता से सीपके टुकड़े में रजतदृष्टि करते हैं वैसे ही अतत्त्वज्ञ लोग चिदात्मक मलिन तत्त्व को चित्तरूप से देखते हैं, तत्त्वज्ञ नहीं देखते | अपने में स्थित अज्ञान से ही बन्ध होता है और बोध के बलसे मोक्ष होता है