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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 99, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

यदिदं विततं दुःखं तत्तनोति स्वयं मनः । स्वयमेवातिखिन्नं तु पुनस्तस्मात्पलायते ॥ ३८ ॥ संकल्पवासनाजालैः स्वयमायाति बन्धनम् । मनो लालामयैर्जालैः कोशकारकृमिर्यथा ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो यह दुःख विस्तार को प्राप्त हुआ है, उसको मन ही स्वयं बढाता है । फिर स्वयं ही बन्धन में पडता है वैसे ही मन अपने संकल्पवासनाजालों से स्वयं ही बन्धन मे पडता हे