Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 99, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
विचारालोकलभ्येयं यदैकेनैव वस्तुना ।
पूर्णा नान्येन संयुक्ता केवलेव तदैव सा ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि को शंका करे कि कब वह शून्य होती है अथवा ऐसी वह किस उपाय से प्राप्त होती
है, तो इस पर कहते हैं।
यह जब अद्वितीय वस्तु से (ब्रह्म से) ही पूर्ण होती है, अन्य वस्तु से इसका कोई संपर्क
नहीं रहता है तभी यह शून्य सी होती है । इस प्रकार की (शून्य-सी) यह “तत्-त्वम्'
पदार्थशोधनात्मक केवल विचाररूपी प्रकाश से प्राप्त होती है