Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 99, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 99, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 99 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
अपश्यन्काष्ठरन्ध्रस्थवृषणाक्रमणं यथा ।
कीलोत्पाटी कपिर्दुःखमेतीदं हि तथा मनः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस विषय मे लौकिक गाथा का उदाहरण देते है ।
जैसे आधे चीरे हुए खम्भे में डाली हुई कील को उखाडनेवाला वानर, यह ध्यानमें न
रखकर कि कील निकालने से काठ के छिद्र के बीचमें स्थित मेरे वृषण दब जायेंगे, दुःख पाता
है, वही दशा मन की भी है (& )