Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 1, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नीहार इव विस्तारि गृहीतं सन्न किंचन ।
जडशून्यास्पदं शून्यं केषांचित्परमाणुवत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कुहरे के समान यह विस्तार युक्त है ओर गृहीत होने पर कुछ भी नहीं हे । सांख्यवादियों
ने केवल जड़रूप से इसकी कल्पना कर रक्खी हे । वेदान्तियों ने इसको अविद्यारूप माना हे । माध्यमिक
इसे शून्य मानते हैँ । योगाचार्य क्षणिक होने के कारण कालतः इसे परमाणु तुल्य मानते हैं । सौत्रान्तिक
ओर वैभाषिको के मत में कालतः ओर देशतः परमाणु तुल्य है वैशेषिक ओर नैयायिक इसको केवल
देशतः ही परमाणुवत् मानते हैं ओर जैनियों ने इसे अनियत स्वभाव परमाणु के तुल्य माना है । इस
प्रकार वादियों ने इसकी विविधरूप से कल्पना कर रक्खी हे