Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 30–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
इदमित्थं मुने रूपं ममेह परमात्मनः ।
स्वात्मनि स्वयमेवात्मा स्वत एव विजृम्भते ॥ ३० ॥
नेह कर्ता न भोक्तास्ति दृष्ट्या नष्टकलङ्कया ।
बहवश्चेह कर्तारो दृष्ट्याऽनष्टकलङ्कया ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई प्रश्न करे कि आपकी यह सर्वभोक््तृता कहाँ से आई और आपका क्या स्वरूप है तो उस
पर कहते हैं।
यह मूर्तामूर्त जगत परमात्मारूप मेरा यों भोज्यरूप से ही अपने में कल्पित रूप है, क्योकि परमात्मा
अपने में स्वयं ही जगतरूप से विकास को प्राप्त होता है, अतः स्वयं ही इसका उपसंहार करता है, यह
भावार्थ है