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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 55–57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verses 55–57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 55-57

संस्कृत श्लोक

तीव्रसंवेगसंपन्नस्वसंकल्पोपकल्पिते । अथ पुण्यक्षये जाते नीहार इव शार्वरे ॥ ५५ ॥ प्रम्लानकुसुमोत्तंसः खिन्नाङ्गावयवोल्लसः । स पपात तया सार्धं कालपक्वं फलं यथा ॥ ५६ ॥ वैबुधं तत्परित्यज्य नभस्येव शरीरकम् । भूताकाशमथासाद्य वसुधायां व्यजायत ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वर्ग की तरह पुण्य के क्षय से स्वर्ग से पतन भी मन की कल्पना से ही हुआ, इस आशय से कहते हैं । तीव्र वेग से उत्पन्न अपनी कल्पना से कल्पित पुण्यक्षय रात्रि के कुहरे की तरह प्राप्त होने पर उसके पुष्पों की शिरोमालाएँ म्लान हो गयी । अंक के अवयवों का उल्लास धीमा पड़ गया। वह काल से पके हुए फल की नाई उस अप्सरा के साथ स्वर्ग से गिरा। उस दिव्य शरीर का आकाश में ही परित्याग कर वह भूताकाश में आया । तदुपरान्त पृथ्वी में उत्पन्न हुआ