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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verses 64–65

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verses 64–65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 64,65

संस्कृत श्लोक

अयं स पुत्रो भवतो भूत्वा मन्त्रविदां वरः । प्रजजाप पुरा विद्यां विद्याधरपुरप्रदाम् ॥ ६४ ॥ तेनासावभवद्ब्रह्मन्व्योम्नि विद्याधरो महान् । हारकुण्डलकेयूरलीलानिचयलालकः ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुनिजी, आपके इस पुत्र ने मन्त्रवेत्ताओं में सर्वश्रेष्ठ होकर विद्याधर नगर में पहुँचानेवाली विद्या का पहले जप किया था। इसलिए हे ब्रह्मन्‌, यह आकाशगें श्रेष्ठ विद्याधर हुआ, जो कि हार, केयूर आदि भूषणों से एवं विविध लीलाओं से स्त्रियों को आह्वाद देने वाला हुआ