Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
यदैव चित्तं कलितं किलानेनाकलात्मना ।
कोशकारवदात्मायमनेनावलितस्तदा ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
वास्तव में न तो मोक्ष है और न बन्धन है, फिर भी यह आत्मा बन्धन-मोक्षरूप विकारों
से युक्त-सा भ्रान्ति से प्रतीत होता है; क्योकि इसका नित्य, पूर्ण परमात्मरूप अनित्य अविद्याजनित
भोक्ता, भोग्य आदि भाव से तिरोहित है, वही मायामय जगत है ॥ ६ ३॥ इस अखण्ड आत्मा ने जब भी
चित्त की कल्पना की, उसी समय जैसे रेशम के कीड़े को रेशम के तन्तु लपेट लेते हैं वैसे ही इसको चित्त
ने लपेट लिया यानी बाँध दिया