Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 12, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 12, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
मिथ्याभावनया ब्रह्मन्स्वविकल्पकलङ्किताः ।
न ब्रह्म वयमित्यन्तर्निंश्चयेन ह्यधोगताः ॥ २ ॥
ब्रह्मणो व्यतिरिक्तत्वं ब्रह्मार्णवगता अपि ।
भावयन्त्यो विमुह्यन्ति भीमासु भवभूमिषु ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि उससे अभिन्न हैं, तो क्यो वैसा (हम अभिन्न हैं यों) अनुभव नहीं करते ? इस पर कहते हैं।
हे ब्रह्मन्, अपने विकल्प से कलंकित वे जीव देह में आत्मत्व की भ्रान्ति से हम ब्रह्म नहीं हैं, इस
आन्तरिक निश्चय द्वारा शोचनीय दशा को प्राप्त हुए हैं । यानी यद्यपि वे ब्रह्मरूपी सागर में स्थित हैं,
तथापि ब्रह्म से अपनी भिन्नता की (परिच्छिन्नता की) भावना करते हुए नरक के तुल्य योनियों में
घूमते हैं