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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 13, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 13, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 1, 2

संस्कृत श्लोक

काल उवाच । एतासां भूतजातीनामूर्मीणामिव सागरात् । विविधानां विचित्राणां लतानामिव माधवे ॥ १ ॥ भव्या जितमनोमोहा दृष्टलोकपरावराः । जीवन्मुक्ता भ्रमन्तीह यक्षगन्धर्वकिंनराः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त जीवजातियों में से जीवन्मुक्त ही कृतकृत्य हैं और नहीं, ऐसा कहते हैं। काल ने कहा : हे भूगुजी, सागर से उत्पन्न हुई लहरों की भाँति और वसन्त ऋतु में उत्पन्न हुई विविध विचित्र लताओं के तुल्य इन जीव-जातियों में जिन्होंने मन के मोह पर विजय पा ली है और लोक के ऊँच-नीच विविध व्यवहार देख लिये हैं, ऐसे जीवन्मुक्त अतएव कृतकृत्य यक्ष, गन्धर्व, किन्नर (५४५) जगत में भ्रमण करते हैं

सर्ग सन्दर्भ

बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग मन की शक्तियों का वर्णन करके भृगु और काल का शुक्र के समीप में जाने के लिए उठना।