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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, Verses 7–12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 14, verses 7–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 7-12

संस्कृत श्लोक

चञ्चलाश्चमराश्चारून्भूभृन्मण्डलचामरान् । कृताजस्त्रपतत्पुष्पधारासारनिमज्जनान् ॥ ७ ॥ किन्नरान्भूमखर्जूराञ्शाखासरलतां गतान् । परस्परफलाघातक्ष्वेडावर्जितकीचकान् ॥ ८ ॥ धातुपाटलदुर्वक्रान्मर्कटान्नटनोत्कटान् । लतावितानसंछन्नसानूपवनमन्दिरान् ॥ ९ ॥ सिद्धानमरनारीभिर्मन्दारकुसुमाहतान् । धातुपाटलनिर्द्वारपयोदपटसंवृतान् ॥ १० ॥ तटानजनसंसर्गान्बौद्धान्प्रव्रजितानिव । सरितः कुन्दमन्दारपिनद्धलहरीघटाः । सागरोत्कतयेवात्तमधुमासप्रसाधनाः ॥ ११ ॥ पुष्पभारपिनद्धाङ्गान्वृक्षान्पवनकम्पितान् । क्षीबानिव मधुप्राप्तौ घूर्णान्मधुकरेक्षणान् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

एवं चंचल और मनोहर चमरो को देखा जो पर्वतराजके चँवर के तुल्य प्रतीत होते थे । जिनमें निरन्तर फूल गिर रहे थे, ऐसे धारा के प्रवाह में निमज्जन किये हुए किन्नरों को, शाखापर्यन्त सीधे हुए उत्तम जाति के खजूर वृक्षों को और खजूर के फलों से परस्पर ताड़नरूपी क्रीडा द्वारा बॉस को भी फलयुक्त बनानेवाले बन्दरों को भी देखा जिनके विरूप मुख गेरु के तुल्य लाल थे और जो उछलने-कूदने में मस्त थे । पर्वत के शिखरभाग के उपवन में जिनके मन्दिर लताओं के विस्तार से ढके हुए थे, जिन्हें रतिकालका सूचन करने के लिए देवांगनाएँ मन्दार के फूलों से मार रही थी, ऐसे सिद्धों को भी देखा और उन पर्वत के प्रपात देशों को भी देखा, जो गेरु से लाल ओर सघन बादल के समूहों से आच्छन्न तथा मनुष्यों के संचार से शून्य थे, उनकी बौद्धो संन्यासियों से तुलना की जा सकती है, क्योकि वे भी गेरू आदि से लाल ओर सघन वर्त्र से आवृत रहते हैं ओर जन संसर्ग से शून्य होते है; कुन्द ओर मन्दार के फूलों से जिनकी लहरें आच्छन्न थी, ऐसी नदियों को, जिन्होंने मानों समुद्ररूपी कान्त के प्रति अत्यन्त उत्सुकता के कारण मधुमाससम्बन्धी पुष्प, पल्लव आदि अलंकार धारण किये हैं तथा फूलों के भार से आच्छन्न पवन से हिलते हुए वृक्षों को भी देखा, मानों वे वृक्ष मधुमास के (वसन्त के) प्राप्त होने पर चंचल भ्रमररूपी नेत्रो से युक्त थे, अतएव मद्य पीने पर नशे में चठे हुए नेत्रवाले पागल से लगते थे