Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विचारयन्तस्तत्त्वज्ञा इति ते जागतीर्गतीः ।
समङ्गायास्तटात्तस्मात्प्रचेलुश्चञ्चलासवः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्टजी ने कहा : इस प्रकार के तत्त्वज्ञानी, जिनके प्राण चंचल थे, संसार की गतिविधि का
विचार करते हुए उस समंगा नदी के तट से भृगुजी के आश्रम के प्रति चले (चंचल शब्द, यह कथन
प्राणक्रिया से ही उनमें चलन क्रिया हुई आत्मा में क्रिया नहीं है, यह सूचन के लिए हे ।)
सर्ग सन्दर्भ
चौढहर्वौ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग पूर्व शरीर को देखकर शुक्र का विलाप तथा विलाप मेँ हेतु विशेष कथनपूर्वक शरीर के स्वभाव का वर्णन ।