Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
शब्दरूपरसस्पर्शगन्धलोभाद्विमुक्तया ।
निर्विकल्पसमाध्येव तदेतच्छुष्यते गिरौ ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
शब्द, रूप, रस, स्पर्श ओर गन्ध की अभिलाषा से रहित मेरा यह शरीर इतने समय तक मेरे
परोक्ष में और इस समय मेरे प्रत्यक्ष में भी मानों निर्विकल्प समाधि में बैठकर पर्वत में सूख रहा है